India - Many great men have descended from time to time on the land. One such great man was born in the eighth century, who later became famous as Guru Shankaracharya. The unprecedented work that Shankaracharya did in his short lifetime to bind the whole country in cultural unity is an example in itself. Shankaracharya was born in a village called Kaladi in the state of Kerala in the eighth century. His father's name was Shivguru and mother's name was Aryaba. His family was Sanatan righteous Nambudari Brahmin. It is said that many auspicious signs were present on his body. When the father asked the astrologers in this regard, he said, "Your son will be great pundit, famous and lucky. Its fame will spread in the whole world."His childhood name was Shankar. He was only three years old when his father died. Gone . He underwent Upanayan rites at the age of five. After this, mother forwarded them. Sent to Guru for study. The children of Shankara, supernatural and acumen became well versed in other scriptures. By the age of 18, he completed the study of Vedas, Puranas, Gita etc. Soon they were counted among the first class pundits. _ _ _ Shankara studying students and teaching the students and serving the mother. do . He felt the pain of family life and not to marry. Decided The king of Kerala wanted to give him the place of Rajpurohit in the court, but. He politely declined. Shankar took retirement with the permission of his mother. Taking orders from his mother, Shankari, who was absorbed in meditation on the banks of the river Narmada, reached Govind Bhagwatpad. At the time when Shankar reached there, Govind was sitting in a tomb in the Bhagavatapad cave. Tombstone breakdown. But Shankar bowed down to him and said, "Give me the initiation of sannyas and preach self-education." The Guru, impressed by them, initiated him to sannyas and named him 'Shankaracharya'. After retiring, he took the Guru's permission and set out in search of truth. The Guru first suggested him to go to Kashi. Shankaracharya's discourse in Kashi was debated by Vidwan Mandan Mishra. Both Mandan Mishra and his wife Bharti. They were discussing in turn. At first Shankaracharya lost him in debate but Panah: He won when he was scholarly. Mandan became a disciple of Mishra and his wife Shankaracharya. Shankaracharya had four disciples - Torkaracharya, Suresvaracharya, Hastamalak and Padmapada. Acharya Shankaracharya was completely monotheistic but his conscience was full of devotion. In Hinduism, Shankaracharya has an equivalent position with God. Shankaracharya sacrificed his body at a holy place like Kedarnath at the young age of 32 years. His thoughts are still exemplary today. . His last sermon was, "O man! You identify yourself. After identifying yourself, you will recognize God.".
Qquestion
1 . Write the name of Shankaracharya's parents.
2 . From whom did Shankaracharya initiate retirement?
3. With whom did Shankaracharya speak in Kashi? From whom did Shankaracharya learn the truth?
4. Why is Shankaracharya called Jagadguru?
Translation in Hindi
भारत - भूमि पर समय - समय पर अनेक महापुरुषों का अवतरण हुआ है । ऐसे ही एक महापुरुष ने आठवीं शताब्दी में जन्म लिया जो आगे चलकर गुरु शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए । शंकराचार्य ने अपने छोटे - से जीवनकाल में सारे देश को सांस्कृतिक एकता में बाँधने के लिए जो अभूतपूर्व कार्य किया वह स्वयं में एक उदाहरण है । शंकराचार्य का जन्म आठवीं शताब्दी में केरल राज्य के कालड़ी नामक ग्राम में हुआ था । इनके पिता का नाम शिवगुरु तथा माता का नाम आर्यबा था । इनका परिवार सनातन धर्मी नंबुदरी ब्राह्मण था । कहा जाता है कि इनके शरीर पर अनेक शुभ लक्षण विदयमान थे । पिता ने ज्योतिषियों से इस संबंध में पूछा तो उन्होंने बताया , " आपका पुत्र महान पंडित , यशस्वी तथा भाग्यशाली होगा । इसका यश सारे संसार में फैलेगा । "इनके बचपन का नाम शंकर था । ये तीन वर्ष के ही थे तब पिता का देहांत हो । गया । पाँच वर्ष की उम्र में इनका उपनयन संस्कार हुआ । इसके बाद माँ ने इन्हें आगे । अध्ययन के लिए गुरु के पास भेजा । शंकर अलौकिक तथा कुशाग्र बुद्धि के बालक अन्य धर्मग्रंथों में पारंगत हो गए । 18 वर्ष की आयु तक इन्होंने वेद , पुराण , गीता आदि का अध्ययन पूर्ण कर लिया । शीघ्र ही इनकी गणना प्रथम कोटि के पंडितों में होने लगी । _ _ _ विद्या अध्ययन कर शंकर घर में विद्यार्थियों को पढ़ाते तथा माँ की सेवा । करते । गृहस्थ जीवन की पीड़ा को उन्होंने महसूस किया तथा विवाह न करने का । फ़ैसला किया । केरल के राजा ने इन्हें दरबार में राजपुरोहित का स्थान देना चाहा किंतु । इन्होंने बड़ी विनम्रता से अस्वीकार कर दिया । माँ की अनुमति लेकर शंकर ने संन्यास ग्रहण किया । माँ से आज्ञा लेकर शंकर नर्मदा नदी के तट पर तप में लीन संन्यासी गोविंद भगवतपाद के पास पहुँचे । शंकर जिस समय वहाँ पहुँचे गोविंद भगवतपाद गुफा में समाधि लगाए बैठे थे । समाधि टूटने । पर शंकर ने उन्हें प्रणाम किया और बोले , " मुझे संन्यास की दीक्षा तथा आत्मविद्या का उपदेश दीजिए । " गुरु ने इनसे प्रभावित होकर इन्हें संन्यास की दीक्षा दी और इनका नाम ' शंकराचार्य ' रखा । संन्यास लेने के बाद गुरु की आज्ञा लेकर वह सत्य की खोज में निकल पड़े । गुरु ने पहले उन्हें काशी जाने का सुझाव दिया । काशी में शंकराचार्य का वहाँ के प्रकांड विदवान मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ हआ । मंडन मिश्र और उनकी पत्नी भारती दोनों । बारी - बारी से शास्त्रार्थ कर रहे थे । पहले तो शंकराचार्य उनसे शास्त्रार्थ में हार गए परंतु । पनः शास्त्रार्थ होने पर वे जीत गए । मंडन मिश्र और उनकी पत्नी शंकराचार्य के शिष्य बन गए ।शंकराचार्य के चार शिष्य थे - तोरकाचार्य , सुरेश्वराचार्य , हस्तामलक और पद्मपाद । आचार्य शंकराचार्य पूर्णत : अद्वैतवादी थे किंतु इनका अंत : करण भक्ति - भाव से ओत - प्रोत था । हिंदू धर्म में शंकराचार्य को भगवान के समकक्ष स्थान प्राप्त है । शंकराचार्य ने 32 वर्ष की अल्प आयु में ही केदारनाथ जैसे पावन स्थान पर देह त्याग किया । उनके विचार आज भी अनुकरणीय हैं । । उनका अंतिम उपदेश था , " हे मानव ! तू स्वयं को पहचान । स्वयं को पहचानने बाद तू ईश्वर को पहचान जाएगा।
प्रश्न
1 . शंकराचार्य के माता - पिता का नाम लिखिए ।
2 . शंकराचार्य ने संन्यास की दीक्षा किससे ली ?
3 . काशी में शंकराचार्य का शास्त्रार्थ किसके साथ हुआ ? शंकराचार्य को सत्य का ज्ञान किससे प्राप्त हुआ ?
4 . शंकराचार्य को जगदगुरु ' क्यों कहा जाता है ?
Qquestion
1 . Write the name of Shankaracharya's parents.
2 . From whom did Shankaracharya initiate retirement?
3. With whom did Shankaracharya speak in Kashi? From whom did Shankaracharya learn the truth?
4. Why is Shankaracharya called Jagadguru?
Translation in Hindi
भारत - भूमि पर समय - समय पर अनेक महापुरुषों का अवतरण हुआ है । ऐसे ही एक महापुरुष ने आठवीं शताब्दी में जन्म लिया जो आगे चलकर गुरु शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए । शंकराचार्य ने अपने छोटे - से जीवनकाल में सारे देश को सांस्कृतिक एकता में बाँधने के लिए जो अभूतपूर्व कार्य किया वह स्वयं में एक उदाहरण है । शंकराचार्य का जन्म आठवीं शताब्दी में केरल राज्य के कालड़ी नामक ग्राम में हुआ था । इनके पिता का नाम शिवगुरु तथा माता का नाम आर्यबा था । इनका परिवार सनातन धर्मी नंबुदरी ब्राह्मण था । कहा जाता है कि इनके शरीर पर अनेक शुभ लक्षण विदयमान थे । पिता ने ज्योतिषियों से इस संबंध में पूछा तो उन्होंने बताया , " आपका पुत्र महान पंडित , यशस्वी तथा भाग्यशाली होगा । इसका यश सारे संसार में फैलेगा । "इनके बचपन का नाम शंकर था । ये तीन वर्ष के ही थे तब पिता का देहांत हो । गया । पाँच वर्ष की उम्र में इनका उपनयन संस्कार हुआ । इसके बाद माँ ने इन्हें आगे । अध्ययन के लिए गुरु के पास भेजा । शंकर अलौकिक तथा कुशाग्र बुद्धि के बालक अन्य धर्मग्रंथों में पारंगत हो गए । 18 वर्ष की आयु तक इन्होंने वेद , पुराण , गीता आदि का अध्ययन पूर्ण कर लिया । शीघ्र ही इनकी गणना प्रथम कोटि के पंडितों में होने लगी । _ _ _ विद्या अध्ययन कर शंकर घर में विद्यार्थियों को पढ़ाते तथा माँ की सेवा । करते । गृहस्थ जीवन की पीड़ा को उन्होंने महसूस किया तथा विवाह न करने का । फ़ैसला किया । केरल के राजा ने इन्हें दरबार में राजपुरोहित का स्थान देना चाहा किंतु । इन्होंने बड़ी विनम्रता से अस्वीकार कर दिया । माँ की अनुमति लेकर शंकर ने संन्यास ग्रहण किया । माँ से आज्ञा लेकर शंकर नर्मदा नदी के तट पर तप में लीन संन्यासी गोविंद भगवतपाद के पास पहुँचे । शंकर जिस समय वहाँ पहुँचे गोविंद भगवतपाद गुफा में समाधि लगाए बैठे थे । समाधि टूटने । पर शंकर ने उन्हें प्रणाम किया और बोले , " मुझे संन्यास की दीक्षा तथा आत्मविद्या का उपदेश दीजिए । " गुरु ने इनसे प्रभावित होकर इन्हें संन्यास की दीक्षा दी और इनका नाम ' शंकराचार्य ' रखा । संन्यास लेने के बाद गुरु की आज्ञा लेकर वह सत्य की खोज में निकल पड़े । गुरु ने पहले उन्हें काशी जाने का सुझाव दिया । काशी में शंकराचार्य का वहाँ के प्रकांड विदवान मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ हआ । मंडन मिश्र और उनकी पत्नी भारती दोनों । बारी - बारी से शास्त्रार्थ कर रहे थे । पहले तो शंकराचार्य उनसे शास्त्रार्थ में हार गए परंतु । पनः शास्त्रार्थ होने पर वे जीत गए । मंडन मिश्र और उनकी पत्नी शंकराचार्य के शिष्य बन गए ।शंकराचार्य के चार शिष्य थे - तोरकाचार्य , सुरेश्वराचार्य , हस्तामलक और पद्मपाद । आचार्य शंकराचार्य पूर्णत : अद्वैतवादी थे किंतु इनका अंत : करण भक्ति - भाव से ओत - प्रोत था । हिंदू धर्म में शंकराचार्य को भगवान के समकक्ष स्थान प्राप्त है । शंकराचार्य ने 32 वर्ष की अल्प आयु में ही केदारनाथ जैसे पावन स्थान पर देह त्याग किया । उनके विचार आज भी अनुकरणीय हैं । । उनका अंतिम उपदेश था , " हे मानव ! तू स्वयं को पहचान । स्वयं को पहचानने बाद तू ईश्वर को पहचान जाएगा।
प्रश्न
1 . शंकराचार्य के माता - पिता का नाम लिखिए ।
2 . शंकराचार्य ने संन्यास की दीक्षा किससे ली ?
3 . काशी में शंकराचार्य का शास्त्रार्थ किसके साथ हुआ ? शंकराचार्य को सत्य का ज्ञान किससे प्राप्त हुआ ?
4 . शंकराचार्य को जगदगुरु ' क्यों कहा जाता है ?

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