प्राचीन समय की बात है जब भारत में वेदों का पठन - पाठन होता था । ऋषि अपने आश्रमों में रहते थे तथा शिष्यों को वेदों का ज्ञान देते थे । उन्हीं दिनों एक ऋषि थे वाजश्रवा जो कि विद्वान तथा चरित्रवान थे । उनके एक नचिकेता नाम का पुत्र था । एक बार महर्षि वाजश्रवा ने विश्वजित ' यज्ञ किया और उन्होंने प्रतिज्ञा की कि इस यज्ञ में अपनी सारी संपत्ति दान कर दूंगा । कई दिनों तक यज्ञ चलने के बाद यज्ञ की समाप्ति हुई । समाप्ति के बाद महर्षि ने अपनी सारी गाय दक्षिणा में दे दी । दान देकर महर्षि संतुष्ट हो गए । बालक नचिकेता को गायों को दान में देना कुछ अच्छा नहीं लगा क्योंकि वे गाय बूढ़ी तथा दुर्बल थीं । उसे लगा ऐसी गाय दान में देना उचित नहीं है । पिता जी बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं । पुत्र होने के नाते मुझे इस भूल के बारे में पिता जी से विचार - विमर्श, करना चाहिए । इसी उद्देश्य से बालक नचिकेता पिता के पास गया और बोला , " पिता जी आपने जिन बूढ़ी और निर्बल गायों को दान में दिया है वे इस अवस्था में नहीं थीं कि किसी को दान में दी जाएँ । " महर्षि बोले , " मैंने प्रतिज्ञा की थी कि अपनी सारी संपत्त...
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